रविवार, 29 सितंबर 2019

मां करणी का प्रथम अवतार है नागौर की बेटी इंद्र बाईसा पुरुष भेस में घूमती थी, नवरात्रा में देश भर से आते हैं श्रद्धालु

इंद्र बाईसा ग्राम खुड़द तहसील मकराना जिला नागौर

नागौर जिले के मकराना के पास खुर्द ऐसा गांव है जहां एक बेटी की पूजा होती है। यहां जन में बैठी इंद्र बाईसा की ख्याति राजस्थान ही नहीं, देश भर में फैली है। इस गांव में करनी माता का मंदिर है जहां करणी माता के साथ उनकी उपासक आ रही इंद्र बाईसा की पूजा भी होती है। इंद्र बाईसा को चारण समाज की कुलदेवी आवड़ माता की चौथी एवं करणी माता की प्रथम अवतार भी माना जाता है। इंद्र बाईसा का जन्म आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की नवमी को सागर दान के घर बापू बाई की कोख से हुआ।बचपन में ही रह करणी माता की अनन्य भक्त थी एवं कहीं चमत्कार दिखाएं जिससे गांव वाले उन्हें माता का अवतार मानने लग गए। धीरे-धीरे देश प्रदेश में उनकी ख्याति फैली एवं लोग उनके दर्शनों को पहुंचने लग गए। नवरात्र के 9 दिन में यहां देशभर से चारण समाज के ढाई लाख से ज्यादा लोग पहुंचते हैं। 90 साल पहले विक्रम संवत 1988 में इंद्र बाईसा ने करणी माता का मंदिर बनवाया। वह बचपन से ही पुरुष परिधान पहनती थी। उन्होंने शादी नहीं की नीमराणा की। राजकुमारी के पैर ठीक होने पर मंदिर परिसर में ही उनके लिए लकड़ी की कोटडी बनवाई गई जो आज भी मौजूद है। विक्रम संवत 2012 में 48 साल की आयु में उनके देवलोक गमन के बाद करणी माता के मंदिर के पास ही इंद्र माता का मंदिर बना। जहां आज भी उनकी पूजा पुरुष परिधान में ही होती है तथा उनकी प्राचीन मूर्तियां वह तस्वीर भी इसी वेश में मौजूद है। देशभर के कई राज घराने भी इंद्र बाईसा के दर्शनार्थ मंदिर पहुंचते हैं। नवरात्र के दौरान कई श्रद्धालु यहीं रहकर पूरे 9 दिन पूजा करते हैं। हजारों श्रद्धालु पैदल भी आते हैं। 


देशनोक करणी माता मंदिर में गर्भ गृह में प्रवेश कर पूजा की

इंद्र बाईसा ने विश्व प्रसिद्ध देशनोक के मंदिर मैं भी निज मंदिर के अंदर तक जाकर करणी माता की सेवा की थी। हालांकि देशनोक के मंदिर के नियम अनुसार निज मंदिर में पूजा करने वाले व्यक्ति के अलावा उसके परिवार का भी कोई सदस्य तक निज मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकता। लेकिन इंद्र बाईसा को करणी माता का अवतार माने जाने कारण किसी भी समय निज मंदिर में प्रवेश करने पर कोई रोक नहीं थी। 


देखिए वे अनदेखी वस्तुएं  है जो इंद्र बाईसा उपयोग में लेती थी


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 इंद्र बाईसा के मंदिर में वर्तमान में उनके भतीजे भैरू सिंह तथा उनका परिवार पूजा-अर्चना करता है, मंदिर परिसर में एक संग्रहालय बनाया गया है जिसमें इनके कपड़े, चारपाई, बिस्तर, शाल, तलवार, पगड़ी, साहित्यिक सामग्री सहित उनके द्वारा प्रयोग की गई सभी वस्तुएं सुरक्षित रखी गई है। 

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